प्रयागराज महा कुंभ मेला स्नान तिथियाँ-Mahakumbh snan dates

प्रयागराज महा कुंभ मेला स्नान तिथियाँ-Mahakumbh snan dates

महाकुंभ मेला (maha kumbh mela 2025 dates and Mahakumbh snan dates) हिंदू पौराणिक कथाओं में गहरी जड़ें रखता है। यह दुनिया का सबसे बड़ा सार्वजनिक समागम और आस्था का सामूहिक आयोजन है, जिसमें मुख्य रूप से तपस्वी, संत, महंत,साधु, साध्वियाँ, कल्पवासी और विभिन्न क्षेत्रों से आए तीर्थयात्री भाग लेते हैं।

हिंदू धर्म में कुंभ मेला एक धार्मिक तीर्थयात्रा है, जो 12 वर्षों के अंतराल पर चार बार आयोजित की जाती है। इस मेले का आयोजन भारत में चार स्थानों पर होता है, जो चार पवित्र नदियों के किनारे स्थित हैं। ये चार स्थान कुंभ मेले के आयोजन के लिए प्रमुख हैं, और हर बार यह मेला इन स्थानों पर घूमते हुए आयोजित किया जाता है, जैसा कि नीचे सूचीबद्ध है:

  • हरिद्वार, उत्तराखंड में, गंगा के तट पर
  • मध्य प्रदेश के उज्जैन में शिप्रा नदी के तट पर
  • नासिक, महाराष्ट्र में गोदावरी के तट पर
  • उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में गंगा, यमुना और पौराणिक अदृश्य सरस्वती के संगम पर

प्रत्येक कुंभ मेला स्थल का आयोजन सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति की ज्योतिषीय स्थितियों पर आधारित होता है। उत्सव का समय ठीक उस क्षण निर्धारित होता है जब ये ग्रहों की स्थितियाँ पूरी तरह से सामंजस्यपूर्ण होती हैं, क्योंकि इसे हिंदू धर्म में सबसे पवित्र समय माना जाता है। कुंभ मेला एक ऐसा आयोजन है जो खगोलशास्त्र, ज्योतिष, आध्यात्मिकता, अनुष्ठानिक परंपराओं और सामाजिक-सांस्कृतिक रीति-रिवाजों का अद्भुत संगम है, जो इसे ज्ञान की दृष्टि से अत्यधिक समृद्ध और महत्वपूर्ण बनाता है।

कुंभ मेला एक ऐसा आयोजन है जिसमें विभिन्न धर्मों के लोग भाग लेते हैं, जिनमें साधु, नागा साधु, संन्यासी, अध्यात्म के साधक और आम लोग शामिल होते हैं। साधु और नागा साधु अपने कठोर साधना और आध्यात्मिक अनुशासन का पालन करते हैं, संन्यासी अपना एकांतवास छोड़कर केवल कुंभ मेला के दौरान सभ्यता से मिलते हैं, और आम लोग भी इस आयोजन का हिस्सा बनते हैं।

कुंभ मेले के दौरान कई भव्य समारोह आयोजित होते हैं, जिनमें हाथियों, घोड़ों और रथों पर अखाड़ों का पारंपरिक जुलूस, जिसे ‘पेशवाई’ कहा जाता है, शाही स्नान के समय चमचमाती तलवारों और नागा साधुओं की विशेष रस्में, और विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियाँ शामिल होती हैं। ये सभी कार्यक्रम लाखों तीर्थयात्रियों को कुंभ मेला में भाग लेने के लिए आकर्षित करते हैं।

महाकुंभ मेला 2025 का आयोजन प्रयागराज में 13 जनवरी, 2025 से 26 फरवरी, 2025 तक किया जाएगा। इस दौरान कुंभ मेला की महत्वपूर्ण तिथियों का पालन किया जाएगा, जो नीचे दी गई तालिका में उल्लेखित हैं।

प्रयागराज महा कुंभ मेला स्नान तिथियाँ (Mahakumbh snan dates):-

महाकुंभ मेला एक भव्य अनुष्ठानिक समागम है, जिसमें स्नान समारोह को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। त्रिवेणी संगम पर लाखों तीर्थयात्री इस पवित्र स्नान में भाग लेने के लिए एकत्र होते हैं। यह विश्वास है कि पवित्र जल(गंगा, यमुना और पौराणिक अदृश्य सरस्वती के संगम पर) में डुबकी लगाने से व्यक्ति अपने सभी पापों से मुक्त हो सकता है, अपने और अपने पूर्वजों के जन्म-मृत्यु के चक्र से उबर सकता है, और अंततः मोक्ष या आध्यात्मिक मुक्ति प्राप्त कर सकता है।

स्नान अनुष्ठान के अलावा, तीर्थयात्री पवित्र नदी के तट पर पूजा भी करते हैं और विभिन्न साधुओं और संतों के नेतृत्व में ज्ञानवर्धक प्रवचनों में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं।
हालाँकि पौष पूर्णिमा के शुभ अवसर से शुरू होने वाले प्रयागराज महा कुंभ के दौरान पवित्र जल में डुबकी लगाना पवित्र माना जाता है, लेकिन कुछ विशेष तिथियाँ होती हैं जो विशेष महत्व रखती हैं।

इन तिथियों पर संतों, उनके शिष्यों और विभिन्न अखाड़ों (धार्मिक आदेशों) के सदस्य शानदार शोभायात्राएँ निकालते हैं। वे शाही स्नान नामक भव्य अनुष्ठान में भाग लेते हैं, जिसे ‘राजयोगी स्नान’ भी कहा जाता है, और यह महाकुंभ मेले की शुरुआत का प्रतीक होता है। शाही स्नान कुंभ मेले का मुख्य आकर्षण है और उत्सव के शिखर को दर्शाता है। यह परंपरा इस विश्वास पर आधारित है कि इस स्नान के द्वारा लोग पवित्र जल में पूर्व में आए संतों के पुण्य कर्मों और गहन ज्ञान का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

क्र.सं.त्यौहार का नामतिथि दिन
 1 पौष पूर्णिमा 13-01-2025/सोमवार
 2 मकर संक्रांति 14-01-2025/मंगलवार
 3 मौनी अमावस्या (सोमवती) 29-01-2025/बुधवार
 4 बसंत पंचमी 03-02-2025/सोमवार
 5 माघी पूर्णिमा 12-02-2025/बुधवार
 6 महाशिवरात्रि 26-02-2025/बुधवार
Mahakumbh snan dates

Kab hai Shahi Snan 2025 and mahakumbh snan dates:-

पौष पूर्णिमा (Paush Purnima 13 January 2025):-

पौष पूर्णिमा हिंदू कैलेंडर के पौष महीने में शुक्ल पक्ष (बढ़ते चरण) के 15वें दिन आती है, जो पूर्णिमा के आगमन की घोषणा करती है। यह महाकुंभ मेले का अनौपचारिक उद्घाटन है, जो इस भव्य आयोजन की शुरुआत का प्रतीक है। इसके अतिरिक्त, पौष पूर्णिमा कल्पवास की शुरुआत का प्रतीक है, जो महाकुंभ मेले के दौरान तीर्थयात्रियों द्वारा मनाई जाने वाली गहन आध्यात्मिक साधना और भक्ति का समय है।

हला शाही स्नान -मकर संक्रांति (14 January 2025 (First Shahi Snan):-

1. मकर संक्रांति पर पहला शाही स्नान कुम्भ मेला का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र आयोजन होता है। यह स्नान विशेष रूप से मकर संक्रांति के दिन होता है और इसे धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्व दिया जाता है।

पहला शाही स्नान और मकर संक्रांति की विशेषताएँ:

  1. तिथि और महत्व:
    • मकर संक्रांति आमतौर पर 14 जनवरी को होती है और यह दिन सूर्य के मकर राशि (मकर) में प्रवेश करने का प्रतीक है। यह समय उत्तरायण (सूर्य का उत्तर की ओर गति करना) की शुरुआत का होता है, जो हिन्दू धर्म में शुभ और कल्याणकारी माना जाता है।
    • मकर संक्रांति के दिन पहला शाही स्नान सबसे महत्वपूर्ण होता है, जो कुम्भ मेला के प्रारंभ का प्रतीक है।
  2. शाही स्नान (Royal Bath):
    • शाही स्नान मुख्य रूप से नग साधु, महंत, और अन्य प्रमुख संतों द्वारा किया जाता है। ये संत गंगा या अन्य पवित्र नदियों में इस दिन स्नान करते हैं।
    • शाही स्नान के दौरान एक भव्य जुलूस निकलता है, जिसमें मंत्रोच्चार, नगाड़े और अन्य धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। यह स्नान बहुत पवित्र माना जाता है और इसे पापों से मुक्ति और आध्यात्मिक पुनर्जन्म के रूप में देखा जाता है।
  3. आध्यात्मिक महत्व:
    • मकर संक्रांति के दिन पवित्र नदी में स्नान करने से व्यक्ति के पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह स्नान आत्मिक शुद्धि और उन्नति का प्रतीक है।
    • यह दिन आध्यात्मिक जागरण का भी अवसर होता है, जहाँ लोग ईश्वर के साथ अपने संबंधों को और मजबूत करने के लिए इस विशेष दिन का पालन करते हैं।
  4. मकर संक्रांति और सांस्कृतिक महत्व:
    • मकर संक्रांति भारत के विभिन्न हिस्सों में विशेष रूप से त्योहारों के रूप में मनाई जाती है। इस दिन लोग तिल और गुड़ से बनी मिठाइयाँ खाते हैं, पतंगबाजी करते हैं और सूर्य को धन्यवाद देते हैं।
    • कई स्थानों पर यह एक कृषि पर्व के रूप में मनाई जाती है, जो फसल की कटाई के बाद का त्यौहार होता है।

मकर संक्रांति के दिन पहला शाही स्नान कुम्भ मेला का सबसे पवित्र और महत्त्वपूर्ण स्नान होता है। यह स्नान न केवल शारीरिक शुद्धि का प्रतीक है, बल्कि यह व्यक्ति की आत्मिक उन्नति और ईश्वर से एकता की ओर एक महत्वपूर्ण कदम होता है।

2. दूसरा शाही स्नान – मौनी अमावस्या (29 January 2025 (Second Shahi Snan))

मौनी अमावस्या कुम्भ मेला का एक महत्वपूर्ण दिन है, और इस दिन दूसरा शाही स्नान किया जाता है। यह स्नान बहुत पवित्र और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यधिक महत्व रखता है।

2. मौनी अमावस्या और दूसरा शाही स्नान की विशेषताएँ:

  1. मौनी अमावस्या का महत्व:
    • मौनी अमावस्या, माघ माह की अमावस्या को होती है। इस दिन का विशेष महत्व है क्योंकि इसे मौन रहने और ध्यान करने का दिन माना जाता है। हिन्दू धर्म में इस दिन का विशेष महत्व है, क्योंकि यह दिन आध्यात्मिक साधना, ध्यान, और धार्मिक अनुशासन के लिए समर्पित होता है।
    • मौनी अमावस्या पर मौन रहकर गंगा या अन्य पवित्र नदियों में स्नान करने से व्यक्ति की आत्मा शुद्ध होती है और उसे आध्यात्मिक लाभ मिलता है।
  2. दूसरा शाही स्नान:
    • इस दिन कुम्भ मेला में दूसरा शाही स्नान किया जाता है, जिसे नग साधुओं, महंतों, और आध्यात्मिक साधकों द्वारा किया जाता है।
    • इस स्नान के दौरान श्रद्धालु मौन रहते हुए गंगा या अन्य पवित्र नदियों में स्नान करते हैं। मौनी अमावस्या पर स्नान करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति और आध्यात्मिक शुद्धता मिलती है।
  3. आध्यात्मिक लाभ:
    • मौनी अमावस्या पर स्नान करने से व्यक्ति के भीतर की सारी नकारात्मकता और पाप समाप्त हो जाते हैं, और उसे आध्यात्मिक उन्नति और धार्मिक शांति प्राप्त होती है।
    • यह दिन ध्यान और साधना का दिन होता है, जहाँ साधक अपनी आत्मा के भीतर शांति प्राप्त करने के लिए गहरी साधना में लीन होते हैं।
  4. आध्यात्मिक साधना:
    • इस दिन मौन रहते हुए ध्यान करना और अपने भीतर की शांति और सकारात्मक ऊर्जा को महसूस करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।
    • मौनी अमावस्या पर लोग गंगा स्नान के बाद राम नाम जप और ध्यान करते हैं, जिससे उनकी मानसिक स्थिति और आध्यात्मिक यात्रा में मदद मिलती है।

सारांश:

मौनी अमावस्या पर दूसरा शाही स्नान कुम्भ मेला का एक महत्वपूर्ण पर्व है। इस दिन स्नान करने से व्यक्ति को शुद्धि, पापों से मुक्ति और आध्यात्मिक उन्नति मिलती है। यह दिन ध्यान और साधना का होता है, जिसमें भक्त मौन रहते हुए अपने भीतर की शांति को महसूस करते हैं।

3. तीसरा शाही स्नान – बसंत पंचमी (03 February 2025 (Third Shahi Snan))

बसंत पंचमी कुम्भ मेला का एक और महत्वपूर्ण दिन है, और इस दिन तीसरा शाही स्नान किया जाता है। यह दिन विशेष रूप से सरस्वती पूजा और वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है। बसंत पंचमी का महत्व हिन्दू धर्म में विशेष रूप से ज्ञान, शिक्षा, और सकारात्मक ऊर्जा से जुड़ा हुआ है।

बसंत पंचमी और तीसरे शाही स्नान की विशेषताएँ:

  1. बसंत पंचमी का महत्व:
    • बसंत पंचमी हिन्दू पंचांग के अनुसार माघ माह की पंचमी तिथि को मनाई जाती है। यह दिन विशेष रूप से सरस्वती पूजा और वसंत ऋतु के आगमन का पर्व होता है।
    • बसंत पंचमी के दिन को ज्ञान की देवी सरस्वती का पूजन किया जाता है, और इस दिन विशेष रूप से वसंत ऋतु का स्वागत होता है, जो नई ऊर्जा, जीवन और आशा का प्रतीक है।
  2. तीसरा शाही स्नान:
    • इस दिन तीसरा शाही स्नान कुम्भ मेला में प्रमुख रूप से नग साधुओं, महंतों, और अन्य धार्मिक नेताओं द्वारा किया जाता है। यह स्नान गंगा या अन्य पवित्र नदियों में किया जाता है।
    • बसंत पंचमी पर स्नान करने से व्यक्ति की आत्मा शुद्ध होती है, और उसे पापों से मुक्ति मिलती है। इस दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है क्योंकि यह समय वर्षा के मौसम के बाद एक नए जीवन और शुद्धता की शुरुआत का प्रतीक है।
  3. आध्यात्मिक और धार्मिक लाभ:
    • बसंत पंचमी के दिन शाही स्नान से व्यक्ति को शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। यह समय एक नई शुरुआत का प्रतीक है, जहाँ भक्त अपने पुराने पापों को धोकर नई ऊर्जा और जीवन की ओर अग्रसर होते हैं।
    • इस दिन स्नान करने से शरीर और मन में शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
  4. सरस्वती पूजा और ज्ञान का महत्व:
    • इस दिन सरस्वती पूजा का आयोजन होता है, जो विशेष रूप से ज्ञान, शिक्षा, और कलाओं की देवी सरस्वती की पूजा का दिन है। लोग अपने पुस्तकों, लेखनी, और वास्तविक ज्ञान के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं।
    • बसंत पंचमी का यह दिन मानसिक शांति, सकारात्मकता, और आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।

सारांश:

बसंत पंचमी पर तीसरा शाही स्नान कुम्भ मेला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। यह दिन शुद्धि, आध्यात्मिक उन्नति, और ज्ञान की देवी सरस्वती के पूजन का प्रतीक है। इस दिन गंगा स्नान और ध्यान से व्यक्ति को शांति, सकारात्मक ऊर्जा, और आध्यात्मिक उन्नति मिलती है। यह समय नए जीवन की शुरुआत और आत्मिक उन्नति का होता है।

माघी पूर्णिमा (12 February 2025):-

माघी पूर्णिमा गुरु बृहस्पति की पूजा और इस मान्यता के लिए प्रसिद्ध है कि हिंदू देवता गंधर्व स्वर्ग से पवित्र संगम में उतरते हैं। इस दिन, पवित्र घाटों पर तीर्थयात्रियों की एक बड़ी भीड़ उमड़ती है, जो इस विश्वास से प्रेरित होते हैं कि इस शुभ क्षण में उनकी उपस्थिति उन्हें उनके सांसारिक रूपों में रहते हुए भी स्वर्गीय क्षेत्रों की ओर ले जाएगी।

महा शिवरात्रि (26 February 2025)

महा शिवरात्रि का गहरा प्रतीकात्मक महत्व है क्योंकि यह कल्पवासियों के अंतिम पवित्र स्नान का प्रतीक है, और यह भगवान शंकर से आंतरिक रूप से जुड़ा हुआ है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस दिन का स्वर्ग में भी बेसब्री से इंतजार किया जाता है।

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